ओएनजीसी में कार्य किया। कुमायूँ विश्वविद्यालय नैनीताल(डीएसबी,महाविद्यालय नैनीताल) से शिक्षा प्राप्त की।विद्यालय शिक्षा-खजुरानी,जालली,जौरासी और राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित। 7 काव्य संग्रह प्रकाशित। बचपन में गाँव का जीवन जिया और खूब उल्लास से।पहाड़ के गाँव के सभी काम करते थे।

उस धूप को क्या कहूँ

उस धूप को
क्या कहूँ
जो बासंती हो चुकी है,
उस आसमान को
क्या कहूँ
जो सदा ऊँचा रहता है।
उस नदी को
क्या कहूँ
जो तीर्थ बनाते जाती है,
उस गीत को
क्या कहूँ
जो बार-बार मन में आता है।
उस सुबह को
क्या कहूँ
जो बार-बार उठाती है,
उस उम्र को
क्या कहूँ
जो बचपन तक जाती है।
उस प्यार को
क्या कहूँ
जो जन्मभर गुदगुदाता है,
उस हाथ को
क्या कहूँ
जो सदा आशीषता है।
*********
*महेश रौतेला

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कोई सच ,सच नहीं होता
जैसे राजनैतिक सच,
कोई झूठ,झूठ नहीं होता
जैसे राजनैतिक झूठ।

*महेश रौतेला

तुम्हारे पास से गुजरता था
तो सिहरन दौड़ जाती थी,
जो कुछ मुझमें, कुछ तुममें दिखायी देती थी।


वे भी क्या दिन थे
जब आँखों से आँखें मिला करती थीं,
बिन बात के तूफान खड़े होते थे।

हमारे दिल ने कभी गवाही नहीं दी,
तुम्हारे दिल ने कभी फैसला नहीं सुनाया।

*महेश रौतेला

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बहुत महत्व है शिखरों का
जो हमसे ऊँचे लगते हैं,
बहुत महत्व है मिट्टी का,
जिस पर हम चलते हैं।

*महेश रौतेला

बेटी

तुम्हारा हँसना,
तुम्हारा खिलखिलाना,
तुम्हारा चलना,
तुम्हारा मुड़ना ,
तुम्हारा नाचना ,
बहुत दूर तक गुदगुदायेगा।
मीठी-मीठी बातें ,
समुद्र की तरह उछलना,
आकाश को पकड़ना ,
हवा की तरह चंचल होना,
बहुत दूर तक याद आयेगा ।
ऊजाले की तरह मूर्त्त होना,
वसंत की तरह मुस्काना,
क्षितिज की तरह बन जाना,
अंगुली पकड़ के चलना,
बहुत दूर तक झिलमिलायेगा।
तुम्हारे बुदबुदाते शब्द ,
प्यार की तरह मुड़ना ,
ईश्वर की तरह हो जाना ,
आँसू में ढलना,
बहुत दूर तक साथ रहेगा।
समय की तरह चंचल होना,
जीवन की आस्था बनना ,
मन की जननी होना,
बहुत दूर तक बुदबुदायेगा।
* महेश रौतेला
***अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं।

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विशाल है भारत
अपनी भाषा का सरताज है भारत,
गंगा की लिखावट है भारत
हिमालय का निवास है भारत।

नदियों का प्रवाह है भारत
वृक्षों का सौन्दर्य है भारत,
शब्दों का श्रृंगार है भारत,
ऋतुओं का परिष्कार है भारत।

संस्कृति में नमस्कार है भारत
सभ्यता में स्नेह है भारत,
चलने का आह्वान है भारत
जन-जन का स्वाभिमान है भारत।

**महेश रौतेला

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क्रम

एक दिन विराम लग जायेगा
साँसें थम जायेंगी,
आलोचना-सराहना का दौर ठप्प हो जायेगा।
खिड़की पर बैठना
पहाड़ों पर जाना,
रास्तों को झाँकना
गीतों पर थिरकना,
उड़ती चिड़िया को देखना,
बन्द हो जायेगा।
प्यार भरे वार्तालाप
आकाश सी खुली मुस्कान,
शौर्य का सौन्दर्य
धरती पर पड़े कदम,
परोपकार के कथानक
स्मृति बन जायेंगे।
उतरते-चढ़ते संदर्भ
सुख-दुख का व्यापार,
त्यौहारों की मस्ती
लोगों का मिलना,मेलों में जाना,
गपशप का होना
जीवन से उतर जायेंगे।
*******
* महेश रौतेला

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जहाँ मैंने प्यार किया

जहाँ मैंने प्यार किया
वहाँ बस जाऊँ,
जहाँ जवानी में दौड़ा
वहाँ बुढ़ापे में बैठ जाऊँ,
जिसे जैसे देखा
उसे वैसे याद कर लूँ,
जिस पेड़ पर चढ़ा
उसकी छाया ले लूँ,
जिन ऊँचाइयों को नापा
उधर दृष्टि बना लूँ,
जिस यात्रा में थका
उसे विश्राम दे दूँ,
जिस देवता को प्रणाम किया
उनको धन्यवाद दे दूँ,
जहाँ मैंने प्यार किया
बस, वहाँ बस जाऊँ।
********

* महेश रौतेला

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मानवता त्रस्त है
मनुष्य यहाँ विभक्त है,
इस राह पर, उस राह में
कहते हैं, सब सही है।

गली-गली में शोर है
सम्बंध वहाँ चोर हैं,
इस दृष्टि-दोष से
तलवार पर रक्त है।

*महेश रौतेला

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हे कृष्ण जो मरा हुआ है

हे कृष्ण
जो मरा हुआ है
उसे जीवित कर दो,
जो भ्रष्ट है
उसे नष्ट कर दो,
जो संस्कृति विहीन है
उसे संस्कार दे दो।
जो कटु है
उसे मधुर कर दो,
जो जहर है
उसे अमृत बना दो,
जो सोया है
उसे उठा दो,
जहाँ गीत न हो
वहाँ गीत सुना दो,
जो अन्त है
उसे आदि से जोड़ दो।
****** २०१०

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